रायपुर (पी. श्रीनिवास राव/मनोज व्यास). झीरम घाटी हत्याकांड के 7 साल बाद अब इसकी जांच के बहाने छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने सीधे केंद्र सरकार पर निशाना साधकर प्रदेश में नई राजनैतिक बहस छेड़ दी है। सीएम भूपेश बघेल ने पूर्ववर्ती डॉ. रमन सरकार के कार्यकाल में भी झीरम हत्याकांड की नए सिरे से जांच को लेकर आक्रामक तेवर अपना रखे थे। इस बार केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से सीधे ही भूपेश ने एनआईए की केस डायरी मांगकर इस मामले को एक बार फिर हवा दे दी है। दैनिक भास्कर ने सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील विवेक तनखा और एनसीआरबी के पूर्व डीजी राजीव माथुर से इस मामले का स्टेटस जानने का प्रयास किया है।
जांच में सियासी साजिश को छोड़ने के लगे हैं आरोप
कांग्रेस जब विपक्ष में थी, तब से ही हत्याकांड में बड़े राजनीतिक षड्यंत्र का आरोप लगाती रही है। एनआईए ने अपनी जांच में 88 नक्सलियों को आरोपी बनाया है। 24 सितंबर 2014 को 9 के खिलाफ पहली चार्जशीट दाखिल की गई। इसके बाद 28 सितंबर 2015 को 30 लोगों के खिलाफ सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की गई। कांग्रेस का आरोप रहा है कि एनआईए ने नक्सल हमले की थ्योरी पर ही जांच की, जबकि जांच के दौरान राजनीतिक षड्यंत्र को नजरअंदाज किया। इस पूरे मामले में केस डायरी इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि डायरी मिलने पर ही राज्य सरकार द्वारा बनाई गई एसआईटी आगे जांच कर पाएगी। इसीलिए राज्य सरकार ने केंद्रीय गृह सचिव को केस डायरी देने के लिए पत्र लिखा था।
केंद्र सरकार वापस नहीं करेगी केस डायरी : पूर्व डीजी
पूर्व डीजी एनसीआरबी राजीव माथुर ने बताया कि झीरम घाटी घटना की जांच पर आंच क्यों आई? सर्वप्रथम तथ्य यह है कि जीवित गवाहों के बयान समाचार पत्रों में प्रकाशित हुए उनके अनुसार नक्सलियों ने नेताओं के नाम जोर-जोर से पुकारे थे और जंगल के अंदर ले जाकर मारा था। आरोप है कि सभी जीवित गवाहों के बयान भी नहीं लिये गए। अगर नाम पुकारे गए थे तो 10 गिरफ्तार अभियुक्तों से इस बाबत पूछताछ की गई? यदि हां तो क्या निष्कर्ष निकला? एक तर्क यह भी है कि गिरफ्तार किए गए अभियुक्त निचली पायदान के नक्सली थे, जिन्हें राजनैतिक साजिशों की जानकारी नहीं हो सकती। जब वरिष्ठ नक्सली पकड़े जाएंगे तो साजिश स्पष्ट हो सकेगी। प्रश्न यह है कि घटना के 7 वर्ष बाद क्या कोई ऐसे साक्ष्य छग पुलिस के हाथ लगेंगे जिनसे साजिश का पर्दाफाश हो सके। सारे सबूत नष्ट हो चुके होंगे या धूमिल पड़ चुके होंगे। अब मोबाइल डाटा भी जाँच हेतु उपलब्ध नहीं होगा। शुरू का क्रिटिकल समय निकल चुका है। तभी कुछ सार्थक पहल होगी और साजिश का पर्दाफाश होगा जब वरिष्ठ नक्सली पकड़े जाएंगे। यह भी तय है कि केंद्र सरकार केस वापस नहीं करेगी।
संतुष्ट करना होगा कि क्यों डायरी नहीं दे रहे :विवेक तन्खा
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील विवेक तन्खा ने बताया कि सीआरपीसी में किसी केस की दोबारा जांच नहीं होती। यह तभी संभव है, जब सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट का आदेश या अनुमति हो। राज्य इसी मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट गया है। राज्य एनआईए की जांच से संतुष्ट नहीं है, क्योंकि एजेंसी ने जांच पूरी नहीं की है। यदि किसी मामले में हिस्सेदार को संतुष्टि नहीं मिल रही है तो केंद्र को एक तरह से नए सिरे से जांच करना चाहिए या केस वापस भेजे। केंद्र ने यहां स्टेट एक्ट को चैलेंज किया हुआ है, क्योंकि लॉ एंड आर्डर राज्य से संबंधित है। यह घटना इसी से जुड़ी है। एेसे मामलों में केंद्र तभी जांच कर सकता है जब राज्य सरकार अनुमति दे या न्यायालय ऑर्डर करे। कोर्ट को यही डिसाइड करना है कि केंद्र, राज्य के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर सकता है या नहीं। हां या नहीं दोनों ही मामलों में केंद्र, राज्य को संतुष्ट करे कि झीरम मामले में एनआईए जांच पूरी हो गई है या अधूरी। उसे जांच के बिंदुओं को शेयर भी करना चाहिए, क्योंकि राज्य इसमें स्टेक होल्डर है। राज्य सरकार इसलिए सुप्रीम कोर्ट गई है कि वह परिभाषित करें कि केंद्र जांच कर सकता है या नहीं।