काेई जज यह दावा नहीं कर सकता कि उसने कभी गलत आदेश नहीं दिया, गलती इंसानों से होती है


नई दिल्ली. सुप्रीम काेर्ट ने कहा है कि काेई भी जज यह दावा नहीं कर सकता कि उसने कभी काेई गलत आदेश पारित नहीं किया। जब तक गलत आचरण और बाहरी प्रभाव का स्पष्ट आराेप न हाे, तब तक सिर्फ इस आधार पर अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती कि न्यायिक अधिकारी ने गलत आदेश पारित किया है।


जस्टिस दीपक गुप्ता और अनिरुद्ध बाेस की बेंच ने पिछले हफ्ते पारित एक फैसले में कहा कि गलती इंसानाें से ही हाेती है। न्यायिक पद पर बैठे हम लाेगाें में से काेई भी दावा नहीं कर सकता है कि उसने कभी भी काेई गलत आदेश पारित नहीं किया। न्यायपालिका की स्वतंत्रता पवित्र है। जब तक यह मजबूत, निडर और स्वतंत्र नहीं हाेगी, ना ताे कानून का शासन हाेगा और ना ही लाेकतंत्र हाेगा। स्वतंत्रता और निडरता की उम्मीद सिर्फ बड़ी अदालताें में नहीं, जिला अदालताें में भी की जाती है। ज्यादातर वादी हाईकाेर्ट या सुप्रीम काेर्ट तक पहुंचने में समर्थ नहीं हैं। सभी अदालतों को बाहरी दबाव से प्रभावित हुए बिना दस्तावेजाें में दर्ज तथ्याें के आधार पर फैसला करने में सक्षम हाेना चाहिए।



काेर्ट ने बिहार के एक न्यायिक अधिकारी की अाेर से दायर याचिका पर जारी आदेश में यह टिप्पणी की। उन्हाेंने अपने खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई काे चुनाैती दी थी। अब उनका निधन हाे चुका है। उनके खिलाफ दाे आराेपाें में अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की गई थी। पहला-हाईकाेर्ट से जमानत याचिका खारिज हाेने के बावजूद हत्या के मामले में अाराेपियाें काे जमानत देना। दूसरा-नार्काेटिक्स के एक मामले में अाराेपी काे बरी करना और जल्दबाजी में कार्यवाही बंद करना। बेंच ने अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई रद्द कर दी। बेंच ने कहा कि काेर्ट ने बार-बार वह मानदंड तय किए हैं, िजनके अाधार पर न्यायिक अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।


जज के गलत आदेशों का उल्लेख सर्विस रिकाॅर्ड में किया जाए: कोर्ट
बेंच ने कहा कि न्यायिक अधिकारी कानूनी मानकाें के उलट आदेश0 देता है, पर उस पर बाहरी दबाव से प्रभावित हाेने का अाराेप नहीं है ताे हाईकाेर्ट एेसे मामलाें से एडमिनिस्ट्रेटिव तरीके से निपटें। इसका उल्लेख अधिकारी के सर्विस रिकाॅर्ड में किया जाना चाहिए।